| 📌 अपडेट (सितंबर 2026): ग्रामीण विकास मंत्रालय ने समय पर मजदूरी भुगतान की निगरानी के लिए अलग मानक संचालन प्रक्रिया (SoP) जारी की है। इसमें पहली बार मस्टर रोल बंद होने से लेकर खाते में पैसा आने तक की दिन–वार समय–सीमा (T+15) तय हुई है — किस दिन तक हाजिरी चढ़ेगी, कब तक नाप होगी, कब तक FTO पर हस्ताक्षर होंगे और कब तक पैसा खाते में आएगा। दूसरी बड़ी बात: मुआवज़े का दावा कार्यक्रम अधिकारी को 15 दिन के भीतर तय करना होगा। दावे बिना निर्णय के लटकाए नहीं जा सकते, और मुआवज़ा सिर्फ़ दो हालात में ही रोका जा सकता है। |
गाँव में मजदूरी को लेकर सबसे आम बात यही सुनाई देती है — “काम तो कर लिया, पैसा कब आएगा, पता नहीं।” पूछने पर जवाब मिलता है कि फ़ाइल आगे चली गई है।
VB-G RAM G अधिनियम, 2025 में यह जवाब अब काफ़ी नहीं है। कानून कहता है कि मजदूरी मस्टर रोल बंद होने के 15 दिन के भीतर खाते में आ जानी चाहिए। इसके बाद हर दिन की देरी पर मजदूर को विलंब मुआवज़ा मिलता है — बकाया मजदूरी का 0.05% प्रति दिन।
और सबसे काम की बात यह है कि इसके लिए आवेदन नहीं करना पड़ता। सिस्टम खुद हिसाब लगाता है। मैं इस लेख में पूरी बात समझा रही हूं — कितना मिलेगा, कब से जुड़ता है, कौन देता है और देरी होने पर कहाँ पूछना है।
सीधा जवाब — विलंब मुआवज़ा क्या है?
| अगर मस्टर रोल बंद होने के पंद्रह दिन के भीतर मजदूरी नहीं मिली, तो मजदूर को सोलहवें दिन के बाद की हर दिन की देरी पर बकाया मजदूरी का 0.05% मुआवज़ा पाने का हक़ है। यह VB-G RAM G अधिनियम की अनुसूची II के पैरा 6 में दर्ज है। कौन देगा: राज्य सरकार, जाँच के बाद पहले अपनी ओर से। बाद में वह यही रकम उस अधिकारी या एजेंसी से वसूलती है जिसकी वजह से देरी हुई। इसमें केंद्र सरकार का कोई हिस्सा नहीं होता। ध्यान दें: मुआवज़े के लिए अलग से आवेदन नहीं करना पड़ता। VB-G RAM G Soft मस्टर रोल बंद होने की तारीख़ और खाते में पैसा जमा होने की तारीख़ देखकर गणना अपने आप करता है। |
एक नज़र में — पूरी जानकारी
| बिंदु | विवरण |
| किस कानून के तहत | VB-G RAM G अधिनियम, 2025 — धारा 5(3) और अनुसूची II, पैरा 6 |
| मजदूरी कब तक मिलनी चाहिए | साप्ताहिक आधार पर, और किसी भी हाल में मस्टर रोल बंद होने के 15 दिन के भीतर |
| मुआवज़े की दर | बकाया मजदूरी का 0.05% प्रति दिन |
| कब से जुड़ना शुरू | मस्टर रोल बंद होने के सोलहवें दिन के बाद से |
| किसे मिलता है | अकुशल मजदूर / मजदूरी पाने वाले श्रमिक |
| कौन देता है | राज्य सरकार — केंद्र:राज्य अनुपात 0:100 |
| किससे वसूला जाता है | देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारी या एजेंसी से |
| गणना कौन करता है | VB-G RAM G Soft (MIS) — अपने आप |
| दावा कौन तय करेगा | कार्यक्रम अधिकारी (PO) — देय होने से 15 दिन के भीतर |
| निगरानी कौन करेगा | जिला कार्यक्रम समन्वयक (DPC) |
| आवेदन ज़रूरी? | नहीं — व्यवस्था अपने आप जोड़ती है |
| भुगतान कैसे | DBT से सीधे मजदूर के बैंक खाते में |
कानून क्या कहता है
| प्रावधान | क्या कहता है |
| धारा 5(3) | मजदूरी का भुगतान साप्ताहिक आधार पर होगा, और किसी भी हाल में काम होने की तारीख़ से पंद्रह दिन से ज़्यादा देर में नहीं |
| अनुसूची I, पैरा 16 | भुगतान केवल उसी नाप के आधार पर होगा जो अधिकृत तकनीकी कर्मचारी कार्यस्थल पर, मस्टर रोल बंद होने के तीन दिन के भीतर लेकर डिजिटल रूप से दर्ज करेंगे |
| अनुसूची II, पैरा 6(1) | पंद्रह दिन में मजदूरी न मिलने पर, सोलहवें दिन के बाद की हर दिन की देरी पर बकाया मजदूरी का 0.05% मुआवज़ा |
| अनुसूची II, पैरा 6(2) | मुआवज़ा देय होने की तारीख़ से पंद्रह दिन से ज़्यादा की देरी को मजदूरी की देरी की तरह ही माना जाएगा |
| अनुसूची II, पैरा 6(4) | MIS खुद मुआवज़े की गणना करेगा — मस्टर रोल बंद होने की तारीख़ और खाते में मजदूरी जमा होने की तारीख़ के आधार पर |
| अनुसूची II, पैरा 6(5) | राज्य सरकार जाँच के बाद मुआवज़ा पहले देगी, फिर देरी के जिम्मेदार अधिकारी या एजेंसी से वसूलेगी |
| अनुसूची II, पैरा 6(6) | व्यवस्था चालू रखने की जिम्मेदारी जिला कार्यक्रम समन्वयक और कार्यक्रम अधिकारी की |
| अनुसूची II, पैरा 6(7) | देरी के दिन, देय मुआवज़ा और वास्तव में दिया गया मुआवज़ा — तीनों MIS में दिखेंगे |
एक अहम बात: गणना का आधार “मजदूरी खाते में पहुँचने की तारीख़” है, न कि “फ़ाइल आगे बढ़ने की तारीख़”। यानी कागज़ पर सब समय से होने के बावजूद अगर पैसा देर से पहुँचा, तब भी मुआवज़ा बनता है।
मस्टर रोल बंद होने से पैसा आने तक — पूरी T+15 समय–सीमा
मस्टर रोल बंद होने की तारीख़ को “T” कहते हैं। SoP के अनुसार उसके बाद हर काम की अधिकतम समय-सीमा तय है। e-मस्टर रोल आम तौर पर छह दिन का बनता है, क्योंकि अधिनियम के अनुसार रोजगार आम तौर पर कम से कम छह लगातार दिन का दिया जाता है, और हफ़्ते में छह कार्यदिवस से ज़्यादा नहीं।
| समय | क्या होगा | कौन करेगा |
| T | मस्टर रोल बंद होने की तारीख़ | — |
| T से T+1 | NMMS से ली गई हाजिरी अपलोड; भौतिक मस्टर रोल की स्थिति में MIS में प्रविष्टि | ग्राम रोजगार सहायक / मेट / डेटा एंट्री ऑपरेटर |
| T से T+4 | कार्यस्थल पर काम की नाप, मेजरमेंट बुक (e-MB) में दर्ज और पोर्टल पर अपलोड | तकनीकी सहायक / कनिष्ठ अभियंता |
| T से T+4 | नाप की जाँच (चेक मेजरमेंट) और MIS में प्रमाणन | सहायक अभियंता / अधिकृत तकनीकी अधिकारी |
| T+5 | हाजिरी व नाप की जाँच, बैंक/APBS विवरण का सत्यापन, मजदूरी सूची बनना और प्रमाणित होना | लेखाकार / सहायक कार्यक्रम अधिकारी / DEO |
| T+6 | FTO बनाना और उस पर डिजिटल हस्ताक्षर | प्रथम हस्ताक्षरकर्ता |
| T+7 | FTO की मंज़ूरी और IFMIS को भेजना | द्वितीय हस्ताक्षरकर्ता |
| T+8 से T+9 | IFMIS में भुगतान फाइलों का समेकन और PFMS को भेजना | राज्य IFMIS / कोषागार / DDO |
| T+10 से T+15 | PFMS से दैनिक स्वीकृति, RBI से निपटान, NPCI से सत्यापन, और खाते में मजदूरी जमा | PFMS / RBI / NPCI / बैंक / मंत्रालय |
सीधा मतलब: गाँव के स्तर का पूरा काम T+7 तक खत्म हो जाना चाहिए। उसके बाद का हिस्सा खजाना और बैंकिंग व्यवस्था का है। अगर मजदूरी 15 दिन के बाद आई है, तो देरी इन्हीं चरणों में से किसी एक में हुई है — और हर चरण का जिम्मेदार तय है।
जवाबदेही के पाँच चरण
अधिनियम राज्यों से कहता है कि मजदूरी तय होने और भुगतान तक की प्रक्रिया को चरणों में बाँटें, हर चरण की अधिकतम समय-सीमा तय करें, और हर चरण का जिम्मेदार अधिकारी या एजेंसी अधिसूचित करें। ये पाँच चरण हैं:
- मस्टर रोल का कम्प्यूटरीकरण
- काम की नाप
- नाप का कम्प्यूटरीकरण
- मजदूरी सूची (Wage List) बनना
- FTO बनना और उसकी मंज़ूरी
हिसाब कैसे बनेगा — उदाहरण से समझें
मुआवज़े का सूत्र सीधा है:
| मुआवज़ा = बकाया मजदूरी × 0.05% × देरी के दिन |
मान लीजिए किसी मजदूर की बकाया मजदूरी ₹2,400 है (यह राशि सिर्फ़ समझाने के लिए है — असली राशि आपके काम और आपके राज्य की दर पर निर्भर करेगी)। 0.05% यानी हर दिन ₹1.20। अलग-अलग राशि और अलग-अलग देरी पर हिसाब ऐसे बनेगा:
| बकाया मजदूरी | 10 दिन की देरी | 20 दिन की देरी | 30 दिन की देरी |
| ₹1,200 | ₹6 | ₹12 | ₹18 |
| ₹2,400 | ₹12 | ₹24 | ₹36 |
| ₹4,800 | ₹24 | ₹48 | ₹72 |
| ₹10,000 | ₹50 | ₹100 | ₹150 |
इस तालिका से तीन बातें साफ़ होती हैं:
- रकम छोटी है, पर हक़ है। रोज़ की दर कम लगती है, पर यह अपने आप जुड़ती है और मजदूर को माँगनी नहीं पड़ती।
- असली दबाव जवाबदेही से बनता है। मुआवज़ा राज्य सरकार पहले देती है, फिर उसी अधिकारी या एजेंसी से वसूलती है जिसकी वजह से देरी हुई। यही हिस्सा व्यवस्था पर असर डालता है।
- बड़ी मजदूरी पर रकम बढ़ती जाती है। पूरे मस्टर रोल की बकाया मजदूरी जितनी बड़ी होगी, हर दिन की देरी उतनी ही भारी पड़ेगी — और यही वजह है कि विभाग पर समय से भुगतान का दबाव बनता है।
नोट: देरी के दिन कैसे गिने जाएंगे, यह गणना VB-G RAM G Soft अपने आप करता है — मस्टर रोल बंद होने की तारीख़, मजदूरी मिलने की तारीख़, देरी की अवधि, कुल देय मजदूरी और 0.05% की दर, इन पाँचों को देखकर। ऊपर की तालिका सिर्फ़ सूत्र समझाने के लिए है; अपनी असली राशि अपने भुगतान विवरण से ही मिलाएँ।
दावा कौन और कितने दिन में तय करेगा
- हर कार्यक्रम अधिकारी (PO) को, मुआवज़ा देय होने की तारीख़ से 15 दिन के भीतर तय करना होगा कि सिस्टम द्वारा अपने आप गणना किया गया मुआवज़ा देय है या नहीं।
- दावे इसी अवधि में निपटाने होंगे — उन्हें बिना निर्णय के जमा होने नहीं दिया जाएगा। जिला कार्यक्रम समन्वयक इसकी नियमित निगरानी करेंगे।
- मंज़ूर हुए दावों पर मजदूरी पर्ची बनेगी और FTO अपलोड होगा — ठीक उसी तरह जैसे मजदूरी का भुगतान होता है।
मुआवज़ा सिर्फ़ इन दो हालात में रोका जा सकता है:
| स्थिति | मतलब |
| मुआवज़ा देय ही नहीं है | मजदूरी समय पर दे दी गई थी, पर उसका विवरण MIS में दर्ज नहीं हुआ |
| प्राकृतिक आपदा | देरी प्राकृतिक आपदा के कारण हुई |
इनके अलावा किसी और कारण से दावा खारिज नहीं होगा। और अगर खारिज किया जाता है, तो कार्यक्रम अधिकारी को MIS में खारिज करने के विस्तृत कारण दर्ज करने होंगे। मजदूर के लिए यही सबसे काम की बात है — कारण दर्ज होना अनिवार्य है, इसलिए कारण पूछा जा सकता है।
और एक बात: अगर मुआवज़ा ही देय होने के 15 दिन बाद तक नहीं मिला, तो अधिनियम उसे मजदूरी की देरी की तरह ही मानता है — यानी उस देरी पर भी जवाबदेही बनती है।
मुआवज़े का पैसा कहाँ से आता है
- मुआवज़े में केंद्र सरकार का कोई हिस्सा नहीं होता — केंद्र:राज्य अनुपात 0:100 है। पूरा खर्च राज्य सरकार उठाती है।
- इसके लिए राज्य को अलग राज्य सम्बद्ध योजना (State Linked Scheme) अधिसूचित करनी होती है, अलग बजट लाइन रखनी होती है, और मुआवज़े के लिए अलग RBI खाता खोलना होता है।
- यह पूरी व्यवस्था SNA-SPARSH ढाँचे के भीतर अलग से चलती है, ताकि VB-G RAM G के सामान्य फंड प्रवाह पर असर न पड़े और पूरा ऑडिट ट्रेल बना रहे।
- राज्य मुआवज़ा पहले अपनी उपलब्ध निधि से देता है, और बाद में जिम्मेदार अधिकारी या एजेंसी से वसूलता है। वसूली की प्रक्रिया शुरू कराना और पूरी कराना DPC/PO की जिम्मेदारी है, और वसूली गई राशि वापस उसी खाते में जमा होती है।
केंद्रशासित प्रदेशों के लिए अलग व्यवस्था: जिन केंद्रशासित प्रदेशों में विधानमंडल नहीं है, वहाँ योजना का पूरा खर्च केंद्र सरकार उठाती है और भुगतान Ne-FMS व्यवस्था से होता है। वहाँ भी मजदूरी मस्टर रोल बंद होने के 15 दिन के भीतर ही देनी होती है।
मजदूरी देर से मिली तो क्या करें
- सबसे पहले तारीख़ें नोट कीजिए — मस्टर रोल किस दिन बंद हुआ और पैसा किस दिन खाते में आया। मुआवज़े का पूरा हिसाब इन्हीं दो तारीख़ों से बनता है।
- अपने ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्ड में दर्ज किए गए काम और मिली मजदूरी का ब्योरा मिलाइए। मेट या ग्राम रोजगार सहायक से यह अपडेट कराना आपका हक़ है।
- ग्राम रोजगार सहायक या पंचायत सचिव से पूछिए कि आपके मस्टर रोल पर मुआवज़ा MIS में दर्ज हुआ या नहीं — देरी के दिन और देय मुआवज़ा दोनों सिस्टम में दिखते हैं।
- अगर मुआवज़ा दर्ज नहीं है या खारिज कर दिया गया है, तो ब्लॉक कार्यालय में कार्यक्रम अधिकारी से लिखित में कारण पूछिए। कारण MIS में दर्ज करना अनिवार्य है।
- बैंक खाते और आधार-खाता जुड़ाव (APBS) की स्थिति भी जाँच लीजिए — कई बार भुगतान इसी वजह से रिजेक्ट होकर लौट आता है।
अगर आपको काम ही नहीं मिला है, तो यह अलग मामला है — उस स्थिति में बेरोजगारी भत्ता बनता है, विलंब मुआवज़ा नहीं। दोनों अलग-अलग हक़ हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
विलंब मुआवज़ा क्या है?
अगर मस्टर रोल बंद होने के पंद्रह दिन के भीतर मजदूरी नहीं मिली, तो सोलहवें दिन के बाद की हर दिन की देरी पर मजदूर को बकाया मजदूरी का 0.05% मुआवज़ा मिलता है। यह VB-G RAM G अधिनियम की अनुसूची II, पैरा 6 में दर्ज है।
मुआवज़ा किस दिन से जुड़ना शुरू होता है?
मस्टर रोल बंद होने के सोलहवें दिन के बाद से। पहले पंद्रह दिन भुगतान की तय अवधि है।
T+15 का मतलब क्या है?
T यानी मस्टर रोल बंद होने की तारीख़। T+15 का मतलब है कि उस तारीख़ से पंद्रह दिन के भीतर मजदूरी मजदूर के बैंक खाते में पहुँच जानी चाहिए।
गाँव के स्तर पर काम कब तक पूरा होना चाहिए?
T+7 तक। हाजिरी T+1 तक अपलोड, नाप और जाँच T+4 तक, मजदूरी सूची T+5 तक, FTO पर पहला हस्ताक्षर T+6 और दूसरा हस्ताक्षर T+7 तक।
काम की नाप कब होगी?
मस्टर रोल बंद होने के तीन दिन के भीतर, कार्यस्थल पर अधिकृत तकनीकी कर्मचारी द्वारा, और रिकॉर्ड डिजिटल रूप से दर्ज होगा। यह अधिनियम की अनुसूची I के पैरा 16 में लिखा है।
क्या मुआवज़े के लिए अलग से आवेदन करना पड़ता है?
नहीं। VB-G RAM G Soft मस्टर रोल बंद होने की तारीख़ और खाते में मजदूरी जमा होने की तारीख़ के आधार पर गणना अपने आप करता है।
दावा कितने दिन में तय होगा?
कार्यक्रम अधिकारी को मुआवज़ा देय होने की तारीख़ से 15 दिन के भीतर तय करना होगा। दावे बिना निर्णय के लटकाए नहीं जा सकते, और जिला कार्यक्रम समन्वयक इसकी निगरानी करते हैं।
मुआवज़ा किन कारणों से खारिज हो सकता है?
सिर्फ़ दो हालात में — जब मजदूरी समय पर दे दी गई हो पर MIS में दर्ज न हुई हो, या जब देरी प्राकृतिक आपदा के कारण हुई हो। खारिज करने पर कार्यक्रम अधिकारी को MIS में विस्तृत कारण दर्ज करने होते हैं।
अगर मुआवज़ा भी देर से मिले तो?
अधिनियम के अनुसार, मुआवज़ा देय होने की तारीख़ से पंद्रह दिन से ज़्यादा की देरी को मजदूरी की देरी की तरह ही माना जाएगा।
मुआवज़ा कौन देता है और किससे वसूला जाता है?
राज्य सरकार जाँच के बाद मुआवज़ा पहले अपनी ओर से देती है, और बाद में उस अधिकारी या एजेंसी से वसूलती है जिसकी वजह से देरी हुई। इसमें केंद्र सरकार का कोई हिस्सा नहीं होता।
क्या मुझे पता चलेगा कि कितने दिन की देरी दर्ज हुई?
हाँ। अधिनियम के अनुसार देरी के दिन, देय मुआवज़ा और वास्तव में दिया गया मुआवज़ा — तीनों MIS में दर्ज और उपलब्ध रहते हैं।
विलंब मुआवज़ा और बेरोजगारी भत्ता — दोनों में क्या फ़र्क़ है?
विलंब मुआवज़ा तब बनता है जब काम कर लिया हो पर मजदूरी देर से मिले। बेरोजगारी भत्ता तब बनता है जब माँगने पर काम ही न मिले। दोनों अलग हक़ हैं और दोनों का खर्च राज्य सरकार उठाती है।
स्रोत
ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार — “Standard Operating Procedure on Monitoring of Timely Payment of Wages under Viksit Bharat–G RAM G”; VB-G RAM G अधिनियम, 2025 — धारा 5(3), अनुसूची I पैरा 16, अनुसूची II पैरा 6।
लेखक: सरिता मिश्रा
लेखक: सरिता मिश्रा — सरिता “सरकारी योजना” की मुख्य लेखिका हैं। वे केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं पर शोध करके उन्हें आसान हिंदी में समझाती हैं, ताकि हर आम परिवार ज़रूरी जानकारी आसानी से समझ सके। हर लेख आधिकारिक स्रोतों (PIB, मंत्रालय की वेबसाइट और सरकारी पोर्टल) से जाँचने के बाद ही प्रकाशित किया जाता है।



